लखनऊ के नवाबों ने लखनऊ को 2 अनमोल रत्न दिए हैं – बड़ा इमामबाड़ा और छोटा इमामबाड़ा, जो केवल इमारतें नहीं हैं बल्कि अवध के सुनहरे इतिहास, अविश्वसनीय वास्तुकला और नवाबों की भावनाओं के सबूत हैं।
अगर आपको ऐतिहासिक और भव्य चीज़ें देखना पसंद है और अगर आप लखनऊ आने वाले हैं, तो बड़ा इमामबाड़ा और छोटा इमामबाड़ा आपके लिए एक अच्छा अनुभव हो सकता है। यह कोई सामान्य जगह नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया से लोग यहां कारीगरी की अनोखी इमारतें देखने आते हैं।
इस लेख में मैं आपको रास्ता, नवीनतम किराया (Metro, Bus, Auto) और दोनों इमामबाड़ों की उन गुप्त खासियतों के बारे में बताऊंगा जो आपकी यात्रा को यादगार और आसान बनाएंगी।
तो चलिए शुरू करते हैं बड़ा इमामबाड़ा और छोटा इमामबाड़ा जाने का यह सफर!
लखनऊ कैसे पहुंचें: सही रास्ता और साधन

बड़ा इमामबाड़ा / छोटा इमामबाड़ा पहुंचने के लिए अगर आप लखनऊ के बाहर से आ रहे हैं, तो सबसे अच्छा रहेगा कि आप ट्रेन का इस्तेमाल करके चारबाग रेलवे स्टेशन पर उतरें, जहां से रूमी दरवाज़ा की दूरी लगभग 6 किलोमीटर है और रूमी दरवाज़ा पहुंचने पर आपको वहां से बड़ा इमामबाड़ा / छोटा इमामबाड़ा दोनों ही थोड़ी दूर मिल जाएंगे।
चारबाग से रूमी दरवाज़ा कैसे पहुंचें

चारबाग रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद बड़ा इमामबाड़ा / छोटा इमामबाड़ा, जो रूमी दरवाज़े के पास है, वहां पहुंचने के लिए ये विकल्प हैं:
- लोकल ऑटो: चारबाग से रूमी दरवाज़ा पहुंचने के लिए आप लोकल Auto या ई-रिक्शा का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिसकी सुविधा लखनऊ में काफी अच्छी है। इसके लिए आपको स्टेशन के पास से ही ऑटो मिल जाएगा और मेरी सलाह है कि आप बड़े वाले इलेक्ट्रिक ऑटो ही लें ताकि आप जल्दी पहुंचें। वहां तक पहुंचने के लिए ऑटो का किराया 20 से 25 रुपये ही लगेगा।
- रिज़र्व / बुकिंग ऑटो: लखनऊ में बुकिंग ऑटो या बाइक की सुविधा भी बहुत अच्छी है, जिसमें आप Ola, Uber या Rapido जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके राइड बुक कर सकते हैं। इसका किराया लोकल ऑटो से 30 से 40 रुपये ज़्यादा ही होता है, लगभग 65 से 80 रुपये में आप रूमी दरवाज़ा पहुंच जाएंगे।
बजट और परिवहन: ऑटो, ई-रिक्शा और लोकल बस का नवीनतम किराया (2026)
पुराने लखनऊ की तंग गलियों और हेरिटेज ज़ोन में यात्रा करने के लिए परिवहन के विभिन्न साधनों का किराया ढांचा नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट किया गया है:
| परिवहन का साधन | यात्रा का रूट (कहाँ से कहाँ तक) | अनुमानित नवीनतम किराया (प्रति व्यक्ति / बुकिंग) | यात्रा का प्रकार व टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| लोकल सिटी Bus | चारबाग स्टेशन → बड़ा इमामबाड़ा | ₹20 से ₹30 | सरकारी ई-बसें (सस्ता और वातानुकूलित विकल्प) |
| शेयरिंग Auto | चारबाग → कैसरबाग → इमामबाड़ा | ₹25 से ₹35 | दो टुकड़ों में बदलना पड़ सकता है |
| प्राइवेट Auto/ई-रिक्शा | चारबाग → बड़ा इमामबाड़ा सीधा | ₹80 से ₹120 | पूरी गाड़ी बुक करने पर |
| लोकल हेरिटेज Auto | बड़ा इमामबाड़ा → छोटा इमामबाड़ा | ₹10 से ₹15 (शेयरिंग) / ₹40 (रिज़र्व) | दूरी मात्र 1-1.5 किमी है |
| लखनऊ Metro | चारबाग → केडी सिंह बाबू स्टेडियम | ₹20 | Metro के बाद ₹20 का ई-रिक्शा लेना होगा |
प्रवेश टिकट की कीमत और समय
लखनऊ के हुसैनाबाद एलाइड ट्रस्ट ने यात्रियों की सुविधा के लिए संयुक्त टिकट प्रणाली रखी है, इसका मतलब है कि आपको वहां हर इमारत देखने के लिए बार-बार टिकट के लिए लाइन में नहीं लगना होगा।
भारतीय वयस्क: ₹50 प्रति व्यक्ति; भारतीय बच्चे (5–10 साल): ₹25 प्रति बच्चा; विदेशी पर्यटक: ₹500 प्रति व्यक्ति। संयुक्त टिकट में क्या-क्या शामिल है? ₹50 के इस एक टिकट से आप बड़ा इमामबाड़ा, भूल-भुलैया, शाही बावली, छोटा इमामबाड़ा, पिक्चर गैलरी और शाही हम्माम घूम सकते हैं।
समय: सुबह 6:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक।
ज़रूरी बात: बड़ा इमामबाड़ा सोमवार को बंद रहता है। शुक्रवार को जुमे की नमाज़ के कारण सुबह 10:00 बजे से दोपहर 3:00 बजे के बीच पर्यटकों का प्रवेश आंशिक रूप से प्रतिबंधित या बंद रहता है।
बड़ा इमामबाड़ा: भूल-भुलैया का रहस्य और वास्तुकला का चमत्कार

इतिहास और निर्माण की अनोखी वजह
नवाब आसफ-उद-दौला ने इसका निर्माण 1784 में शुरू करवाया था। और इसे बनवाने की वजह दिल को छू लेने वाली थी। उस समय अवध में भीषण अकाल पड़ा था और नवाब आसफ-उद-दौला अपनी प्रजा को भूखा मरते हुए नहीं देखना चाहते थे, लेकिन वे बिना काम किए किसी को भी मुफ्त में खाना नहीं देना चाहते थे। तब उन्होंने इस इमारत को बनवाने की शुरुआत करवाई और अवध के लोगों को रोज़गार दिया ताकि हर व्यक्ति मेहनत करके अनाज खा सके। लेकिन काम ज़्यादा दिन चले, इसके लिए दिन में मज़दूर काम करते थे और रात को नवाब जी के कहने पर इस इमारत को थोड़ा-थोड़ा तोड़ दिया जाता था, और फिर अगले दिन काम शुरू होता था। इस तरह यह काम बहुत दिनों तक चलता रहा।
खासियतों का विवरण
- केंद्रीय हॉल: बड़ा इमामबाड़ा का मुख्य हॉल लगभग 50 मीटर लंबा और 16 मीटर ऊंचा है। इस हॉल की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसका विशाल कंक्रीट का गुंबद बिना किसी खंभे या लोहे की बीम के सहारे खड़ा है। यह दुनिया की सबसे बड़ी बिना सहारे वाली संरचनाओं में से एक है। छत को सहारा देने के लिए ईंटों को एक खास कोण पर आपस में जोड़ा गया है।
- भूल-भुलैया: मुख्य हॉल की छत के ऊपर बनी यह संरचना भारत की एकमात्र ऐतिहासिक भूल-भुलैया है, जिसमें 489 एक जैसे दिखने वाले दरवाज़े हैं और 1000 से भी ज़्यादा आपस में जुड़े रास्ते हैं। इसे भूल-भुलैया के लिए नहीं बनाया गया था, बल्कि इमारत के वज़न को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
- शाही बावली: परिसर के दाईं ओर स्थित यह पांच मंज़िला बावली है, जिसके दो तल पानी में डूबे हुए हैं और तीन तल पानी के ऊपर हैं। इसका डिज़ाइन ऐसा था कि प्रवेश द्वार पर खड़े किसी भी जासूस या दुश्मन की परछाई एक खास कोण से पानी में साफ दिखाई देती थी, जबकि बाहर खड़ा व्यक्ति इस बात से अनजान रहता था कि अंदर से उस पर नज़र रखी जा रही है।
छोटा इमामबाड़ा: रोशनी का महल और नक्काशी का जादू

बड़ा इमामबाड़ा से लगभग 1.5 किलोमीटर पश्चिम में, हुसैनाबाद क्लॉक टावर के पास छोटा इमामबाड़ा स्थित है — जिसे ‘इमामबाड़ा हुसैनाबाद मुबारक’ के नाम से भी जाना जाता है। इसे 1838 में अवध के तीसरे नवाब मुहम्मद अली शाह ने बनवाया था।
खासियत और विस्तृत विवरण
- रोशनी का महल: इस इमामबाड़े के भीतर बेल्जियम, पेरिस और चीन से मंगाए गए सैकड़ों खूबसूरत झूमर, कांच के लालटेन और रंग-बिरंगे लैंप लगे हुए हैं। यूरोपीय यात्रियों और ब्रिटिश अधिकारियों ने इसकी जगमगाहट को देखकर ही इसे “पैलेस ऑफ लाइट्स” का नाम दिया था। मुहर्रम और विशेष त्योहारों के मौके पर जब इन्हें जलाया जाता है, तो पूरी इमारत सोने की तरह चमक उठती है।
- छोटा ताज (ताजमहल की अनुकृति): छोटा इमामबाड़ा परिसर के भीतर नवाब मोहम्मद अली शाह की बेटी (ज़ीनत आसिया) का एक खूबसूरत मकबरा बना हुआ है, जो दिखने में हूबहू आगरा के ताजमहल की एक छोटी अनुकृति प्रतीत होता है। इसके ठीक सामने एक लंबा तालाब है, जिसमें इमारत का अक्स दिखाई देता है।
- सुलेख कला और वास्तुकला: इसकी दीवारों पर पाक कुरान की आयतें बेहद बारीकी से इस्लामिक शिल्पकारी से उकेरी गई हैं, जो देखने में ऐसी लगती हैं कि इन्हें आज की आधुनिक मशीन भी नहीं बना सकती। इसके सुनहरे गुंबद और तुर्की शैली के मीनार इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं।
विरासत सैर का बोनस: आसपास की अन्य अनसुनी जगहें
जब आप इन दोनों इमामबाड़ों को देखने निकलेंगे, तो आपको इनके बीच 1.5 किलोमीटर के दायरे में कई और शानदार ऐतिहासिक इमारतें देखने को मिलेंगी — जिनके लिए किसी अतिरिक्त टिकट की ज़रूरत नहीं है:
- रूमी दरवाज़ा: जब आप बड़ा इमामबाड़ा से बाहर निकलेंगे, तो आपको 60 फीट ऊंचा यह शानदार दरवाज़ा दिखाई देगा, जिसे लखनऊ की पहचान माना जाता है। इसे ‘तुर्की गेट’ भी कहा जाता है और इसकी बारीक नक्काशी अवधी वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है।
- क्लॉक टावर: 67 मीटर (221 फीट) ऊंचा यह भारत का सबसे ऊंचा क्लॉक टावर है; इसे 1881 में नवाबों की याद में अंग्रेज़ों ने विक्टोरियन-गॉथिक शैली में बनवाया था।
- सतखंडा: क्लॉक टावर के ठीक सामने चार मंज़िला एक अधूरा मीनार है। नवाब मोहम्मद अली शाह इसे दिल्ली के कुतुब मीनार की तर्ज़ पर सात मंज़िला इमारत के तौर पर बनवाना चाहते थे, लेकिन 1842 में उनकी मृत्यु के बाद इसका निर्माण रोक दिया गया।
टूर टिप्स और स्थानीय व्यावहारिक नियम (अनुभवी यात्रियों के लिए)
- टूर गाइड: बड़ा इमामबाड़ा में घूमने के लिए हमेशा एक अधिकारिक गाइड लें, क्योंकि बड़ा इमामबाड़ा की भूल-भुलैया में खो जाना आम बात है। गाइड की रेट लिस्ट आपको काउंटर पर मिल जाएगी। आम तौर पर 2 से 5 लोगों के लिए गाइड 100 रुपये से 200 रुपये चार्ज करते हैं।
- धार्मिक मर्यादा: हर धार्मिक जगह के अपने नियम होते हैं, ठीक उसी तरह यहां का भी नियम है, क्योंकि यह इमारत शिया समुदाय का प्रमुख धार्मिक स्थल है। इसलिए परिसर के मुख्य हॉल में जाने के लिए सभी महिलाओं को अपने सिर को कपड़े से या स्कार्फ से ढकना होगा, और यहां आने वाले हर पर्यटक को इस बात का ध्यान रखना होगा कि छोटे कपड़े पहनकर नहीं आ सकते।
- नंगे पैर चलना: मुख्य इमामबाड़े के अंदर जूते-चप्पल पहनना बिल्कुल मना है, इसलिए आपको वो बाहर स्टैंड पर जमा करने होंगे, जिसका शुल्क 5 से 10 रुपये है। दोपहर या ज़्यादा धूप होने के समय वहां का फर्श बहुत गर्म हो जाता है, इसलिए सुबह 8 से 11 बजे तक ही अंदर जाएं।
- सामान: अंदर बड़े बैग ले जाना मना है, इसलिए बाहर ही क्लॉकर रूम में आपको उसे रखना होगा, जिसका शुल्क 20 रुपये है।
यात्रा का समापन और अवधी ज़ायका
इमामबाड़ों की इस ऐतिहासिक सैर को पूरा करने के बाद, जब शाम ढल रही हो, तो हुसैनाबाद फूड स्ट्रीट या पास के चौक बाज़ार का रुख करें। वहां लखनऊ की मशहूर तंदूरी चाय, मक्खन मलाई (सर्दियों में), और चौक के विश्वप्रसिद्ध टुंडे कबाबी के कबाब-पराठे का स्वाद चखना बिल्कुल न भूलें। यह नवाबी इतिहास और बेजोड़ स्वाद का संगम आपकी लखनऊ यात्रा को मुकम्मल कर देगा।
अंतिम विचार: आखिर में कुछ बातें
बड़ा इमामबाड़ा और छोटा इमामबाड़ा का सफर सिर्फ दो पुरानी इमारतों को देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अवध के सुनहरे इतिहास, बेमिसाल वास्तुकला (बिना सहारे का विशाल हॉल और भूल-भुलैया का रहस्य) और नवाबों की इंसानियत का जीता-जागता सबूत है। जब आप छोटा इमामबाड़ा की “पैलेस ऑफ लाइट्स” की चमक देखते हैं और शाम को रूमी दरवाज़ा के सामने खड़े होते हैं, तब असलियत में समझ आता है कि लखनऊ को नवाबों का शहर क्यों कहा जाता है।
सबसे अच्छी बात यह है कि मात्र ₹50 के संयुक्त टिकट में आपको इतनी समृद्ध विरासत, शाही बावली, पिक्चर गैलरी और भूल-भुलैया घूमने का मौका मिलता है, जो पूरे भारत में शायद ही कहीं और संभव हो। साथ ही चौक का लज़ीज़ स्ट्रीट फूड — टुंडे कबाबी के कबाब-पराठे और मशहूर तंदूरी चाय — इस पुराने लखनऊ के सफर में चार चांद लगा देता है।
तो अगर आप लखनऊ में हैं या यहां आने का प्लान बना रहे हैं, तो अपने शेड्यूल में से एक दिन इस नवाबी विरासत यात्रा के लिए ज़रूर निकालिए। आरामदायक कपड़े और जूते पहनिए, एक अधिकारिक गाइड लीजिए और अवध की तहज़ीब में खो जाइए!

मैं प्रियांशु राज हूँ; मैं लखनऊ के आस-पास की जगहों को देखूँगा और आपके घूमने-फिरने के लिए सबसे अच्छे रास्ते और तरीके बताऊँगा।